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गरीबों के निवाले के लिए सरकार लें, अहम फ़ैसले

@Deepika gaur

आपने भी अपने जीवन में कई बार ये लफ्ज़ जरूर सुने होंगे कि सुबह पापा काम पर जाएंगे तभी रात को घर में चूल्हा जलेगा।

इस कथन से तात्पर्य ये होता था कि गरीबों के घर चूल्हा मतलब कि खाना जब बनता था जब पूरे दिन मेहनत मजदूरी करके घर का मुखिया अपने परिवार का पेट भरने के लिए कुछ सामान एकत्र करने में सक्षम हो पाता था।

भले ही, आज लोगों का रहन - सहन का तौर - तरीका बदल गया हो। लेकिन आज भी दुनिया में ऐसे परिवार है, जिनका पालन पोषण का जिम्मा घर के मुखिया का है और ये मुखिया भी प्रतिदिन मेहनत मजदूरी करके अपना और परिवार का निर्वाह करने में जुटा हुआ है।

लेकिन दुनिया भर में अपने पैर पसार चुका कोरोना वायरस गरीबों के लिए कंगाली में आटा गीला करने जैसी नौबत लेकर आया है।

इस वायरस के बाद जिले में हुए लॉक डाउन के कारण दिहाड़ी मजदूर और ऑटो रिक्शा चालकों का जीवन पूरी तरह अस्त - व्यस्त कर दिया है। क्योंकि जब तक ये रोज तड़के मजदूरी के लिए नहीं निकलते सायं इनके घर में चूल्हा भी नहीं जलता। 

 जब पूरा देश कोरोना वायरस के कारण जूझ रहा है, ऐसे में सबसे ज़्यादा प्रभावित दिहाड़ी मजदूर और ऑटो रिक्शा चालकों जीवन हो रहा है।ना तो उक्त परिवार दो वक़्त की रोजी रोटी के लिए लोकडाउन की स्थिति में कहीं बाहर जा सकता है और ना ही अपने गांव जाकर खेती कर दो वक़्त की रोटी का इंतजाम करने की हालत में हैं।

भले ही सरकार अपने कोष फंड में से ऐसे लोगों को पूर्ण रूप से सहायता करने के दावे कर रही है। लेकिन ये दावे आखिर कब तक ऐसे गरीबों के हक का निवाला देने के नाम पर जुमला साबित होगा या बाकाई ये कोष ऐसे लोगों का पेट भरने में मददगार साबित होगा। सरकार को जरूरत है बीपीएल कार्ड धारकों के साथ ऐसे लोगों की भी सहायता करें, जिन्हें सरकार की मदद की सबसे ज़्यादा जरूरत है। ताकि गरीबों को कोरोना से लड़ने के साथ - साथ अपनी भूख से ना मरना पड़े।


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