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होली में रंगों से ज्यादा होलिका दहन का विशेष महत्व, जानिए विस्तार से

@Deepika sharma

होली का नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहले जो तस्वीर उमड़ कर आती है, वो होती है रंग बिरंगे शक्लों की। अरे भई, बिना रंगों के होली की कल्पना करना तो बिना शक्कर के चाय पीने के बराबर है। वैसे, इस बात में कोई दोराय नहीं है कि होली में जितना महत्व रंगों का होता है उससे कई ज्यादा होलिका दहन का भी होता है। इस वर्ष होली का खुशियों के रंग से भरा त्यौहार 9 मार्च से शुरू हो चुका है। 10 मार्च को रंग वाली होली खेली जाएगी। जिसे होलिका दहन के रूप में मनाया जाता है। लेकिन बहुत कम लोगों को होली से जुड़ी ऐतिहासिक कथा के बारे कोई सटीक जानकारी होती है। लेकिन आज हम आपको होलिका दहन से लेकर होली में रंगों के महत्व के बारे में जानकारी देंगे। तो चलिए जानते है क्या होता है होली का पर्व, इस दिन क्या होता है और इसे क्यों मनाया जाता है ?, बुराई पर अच्छाई का प्रतीक होली होली का त्यौहार फाल्गुन महीने में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। ये त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होता है। इस दिन बच्चे, बुजुर्ग तथा महिलाएं एक दूसरे को रंग लगा कर इस पर्व का आनंद लेते है। होलिका दहन का अपना एक विशेष महत्व हिरण्यकश्यप प्राचीन भारत का एक राजा था जो कि राक्षस था। वह अपने छोटे भाई की मौत का बदला लेना चाहता था जिसे भगवान विष्णु द्वारा मारा गया था। इसलिए अपने आप को शक्तिशाली बनाने के लिए उसने सालों तक घोर तपस्या कर एक वरदान हासिल किया। लेकिन वरदान मिलने के उपरांत हिरण्यकश्यप खुद को भगवान समझने लगा और लोगों से खुद की भगवान की तरह पूजा करने को कहने लगा। इस दुष्ट राजा का एक बेटा था जिसका नाम प्रहलाद था और वह भगवान विष्णु का परम भक्त था। प्रहलाद ने अपने पिता का कहना कभी नहीं माना और वह भगवान विष्णु की पूजा करता रहा। बेटे द्वारा अपनी पूजा ना करने से नाराज उस राजा ने अपने बेटे को मारने का निर्णय किया। उसने अपनी बहन होलिका से कहा कि वो प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए क्योंकि होलिका आग में जल नहीं सकती थी। उनकी योजना प्रहलाद को जलाने की थी, लेकिन उनकी योजना सफल नहीं हो सकी क्योंकि प्रहलाद सारा समय भगवान विष्णु का नाम लेता रहा और बच गया पर होलिका जलकर राख हो गई। होलिका की ये हार बुराई के नष्ट होने का प्रतीक है। इसके बाद भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का वध कर दिया, इसलिए होली का त्योहार, होलिका की मौत की कहानी से जुड़ा हुआ है। इसके चलते भारत के कुछ राज्यों में होली से एक दिन पहले बुराई के अंत के प्रतीक के तौर पर होली जलाई जाती है। त्यौहार का संबंध वसंत की फसल पकने से भी यह कहानी भगवान विष्णु के अवतार से लेकर भगवान कृष्ण के समय की है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान कृष्ण रंगों से होली मनाते थे, इसलिए होली का त्योहार रंगों के रूप में लोकप्रिय हुआ। वे वृंदावन और गोकुल में अपने साथियों के साथ होली मनाते थे। वे पूरे गांव में मज़ाक भरी शैतानियां करते थे। आज भी वृंदावन जैसी मस्ती भरी होली कहीं नहीं मनाई जाती। होली वसंत का त्यौहार है और इसके आने पर सर्दियां खत्म होती हैं। कुछ हिस्सों में इस त्यौहार का संबंध वसंत की फसल पकने से भी है। किसान अच्छी फसल पैदा होने की खुशी में होली मनाते हैं। होली को वसंत महोत्सव या काम महोत्सव भी कहते हैं। केमिकल रंगो के चलते लोगों ने बनाई होली से दूरी पहले होली के रंग टेसू या पलाश के फूलों से बनते थे और उन्हें गुलाल कहा जाता था। वो रंग त्वचा के लिए बहुत अच्छे होते थे क्योंकि उनमें कोई रसायन नहीं होता था। लेकिन समय के साथ रंगों की परिभाषा बदलती गई। आज के समय में लोग रंग के नाम पर कठोर रसायन का उपयोग करते हैं। इन खराब रंगों के चलते ही कई लोगों ने होली खेलना छोड़ दिया है। हमें इस पुराने त्यौहार को इसके सच्चे स्वरुप में ही मनाना चाहिए।


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