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जाने कहा गए वो दिन :बचपन के दिनो के खेल अव तकनीकी में खो गये

@Deepika gaur

लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा’ गाना सुनते ही हम सभी को अपने बचपन के पल याद आ जाते हैं| वो मिट्टी में खेलना, गुड्डे गुड्डिया के साथ खेलना उनकी शादी करवानी, दादी- नानी से राजकुमारी ओर राजकुमार की कहानियाँ सुनना और माँ कि गोदी में लेटकर लोरी सुनते सुनते सो जाना, ह्मारे बचपन की कुछ अनमोल यादें हैं| जिनको याद करके हम आज भी अपने बचपन में लॉट जाते हैं| परंतु आज तकनीकी विकास के बडते कदमो ने बच्चों को हाइ-टेक बना दिया है| आज बचपन की स्वभाविकता दूर होती नज़र आ रही है| इस तकनीकी विकास में खो जाने के कारण बच्चे माता-पिता के प्यार से दूर होते जा रहे हैं| आज पेरेंट्स अपनी व्यस्तता के चलते बच्चों के लिए समय निकालने में असमर्थ हैं वहीं दूसरी ओर तकनीकी विकास के चलते बच्चों के पास भी समय नही रहा है कि वह अपने पेरेंट्स के साथ बेठ कर कुछ बातें कर सकें या थोड़ी मॉज- मस्ती कर सकें| आज बच्चो के खेल व खिलोनो की जगह कंप्यूटर, वीडियो गेम, मोबाइल न आइपॉड ने ले ली है| अब उन्हे ये केरम, चेस व लुडू आदि खेलना बोरिंग लगता है| यहाँ तक की अपने दोस्तों के बीच उनकी बातचीत का मुद्दा भी एलेक्ट्रॉनिक गॅडजेट्स और वीडियो गेम्स ही होते हैं| वहीं इसके विपरीत पहले बच्चों के बातचीत के मुद्दे बिल्कुल अलग ही होते थे जो आज भी जहन में आ जाए तो यादें ताज़ा हो जातीं हैं| ऐसा नही है की बच्चों को ये आदत सीधा टेक्नालजी ने सिखाई है, कहीं ना कहीं माता- पिता इसके पीछे खड़े दिखाई देते हैं| समय के अभाव व इस भागती दोडती ज़िंदगी ने पेरेंट्स को अपने बच्चो से कुछ अलग सा कर दिया है ओर तकनीक को बच्चो के कुछ ज़्यादा ही पास ला दिया है| आज बच्चे को पेरेंट्स से ज्यदा अपने गॅडजेट्स से लगाव है| अगर उनका कंप्यूटर या कोई एलेक्ट्रॉनिक समान खराब हो जाता है तो उनको ऐसा लगता है जैसे पता नही उनकी ज़िंदगी का कौन सा अहम हिस्सा खराब हो गया हो


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