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बचपन बेचकर कर चुकानी पड़ रही दो वक्त रोटी की कीमत

@Deepika gaur

जीवन का सबसे बेहतरीन समय होता है बचपन और सब का बचपन एक जैसा नहीं होता है एक को मैंने पढ़ा था कहीं बचपन नहीं होता सभी का एक जैसा कोई गुब्बारे बेचकर खोज है कोई खरीद कर दो पैसे और कर खुश होता है हमारे देश के सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हमारे समाज में आज भी बाल मजदूरी कायम है 14 साल से कम उम्र के बच्चों का काम करना बाल श्रम बाल मजदूरी कहलाता है कोई भी बच्चा 14 साल से कम उम्र मैं अपनी आजीविका के लिए काम करता है तो वह बाल श्रम की श्रेणी में आता है मजबूरी गरीबी लाचारी और माता-पिता की प्रताड़ना के कारण के बच्चे इस दलदल में फंसे नजर आते हैं पढ़ने खेलने कूदने की उम्र में अनेकों छोटू राजू लक्ष्मी बबलू गुड़िया चिंटू हरि नाम के बच्चे चाय के चप्पल हाईवे के ढाबे लोगों के घरों में जैसी जगहों पर काम करते हैं दिख जाते हैं कभी उनसे पूछा जाए कि काम क्यों करते हो तो जवाब मिलता है कि काम नहीं करेंगे तो खाएंगे क्या हमारे देश में बाल मजदूरी की स्थिति बहुत ही भयावह है सबसे ज्यादा बाल मजदूर भारत में है पर कई एनजीओ समाज में फैली इस स्कूटी को हटाने का प्रयास कर रही है बाल बाल मजदूरी करते हुए बच्चों को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के प्रधानों से गुजरना पड़ता है इस स्थिति में सुधार लाने के लिए सरकार ने 1986 में चाइल्ड लेबर एक्ट बनाया था जिसके तहत बाल मजदूरी को एक अपराध माना गया है सरकार में आठवीं तक की शिक्षा अनिवार्य और निशुल्क कर दिया लेकिन लोगों की गरीबी बेबसी के चलते सारी योजनाएं बेकार साबित हो जाती है 2 जून की रोटी भी जिसको हासिल नहीं उसे कैसे देश का भविष्य कह दें इसका मुख्य कारण सिर्फ और सिर्फ दूसरों के सहारे कभी-कभी जीवन यापन करते हैं उनके लिए दो रोटी की कीमत बचपन देकर चुकाना ज्यादा आसान लगता है चाइल्ड लेबर को खत्म करना होगा तो पहले कई भी खत्म करनी होगी सरकार ने इसके खिलाफ कानून बना दिया इस को अपराध घोषित कर दिया पर इन बच्चों की गंभीरता से कोई सुध नहीं ली दो वक्त का खाना और शिक्षा उनके जीवन के लिए वरदान के सामान साबित होगी इसके लिए सरकार के प्रयास के साथ-साथ आम जनता की सहभागिता भी जरूरी है जो लोग इस काबिल है वह अपने दायित्व को समझते हुए इनकी जिम्मेदारी लेकर देश के भविष्य को बनाने में योगदान कर सकते हैं और दानव सामान बाल श्रम को जड़ से खत्म करने में सहयोग कर सकते हैं


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